लालू जी की अनोखी जुगाड़बाज़ी
लालू जी की अनोखी जुगाड़बाज़ी
गाँव के सबसे बड़े जुगाड़ू थे लालू जी। उनका मानना था कि ज़िंदगी में दो चीज़ें बहुत ज़रूरी हैं—स्मार्टनेस और फ्री की चीज़ें।
एक दिन गाँव में मेला लगा। लालू जी की नज़र सीधे गुप्ता जी की जलेबी की दुकान पर पड़ी। लेकिन समस्या यह थी कि जेब में केवल दो रुपये थे, और जलेबी का रेट पाँच रुपये पाव था।
लालू जी ने दिमाग़ दौड़ाया और बोले, "गुप्ता जी, आज मैं आपके लिए एक ज़बरदस्त ग्राहक लाऊँगा, बस मुझे आधा पाव जलेबी उधार दे दो।"
गुप्ता जी बोले, "लालू, तेरा उधार का इतिहास बहुत लंबा है। पहले पुराना उधार चुकता कर, फिर बात कर।"
लालू जी मुस्कुराए और बोले, "तो एक काम करो, मुझे एक जलेबी का छोटा टुकड़ा चखने दो। अगर मज़ा आ गया, तो पूरा आधा पाव ख़रीद लूँगा!"
गुप्ता जी को ये आइडिया ठीक लगा। उन्होंने एक गरमागरम जलेबी का टुकड़ा लालू जी के हाथ में रख दिया। लालू जी ने धीरे-धीरे उसे चबाया और ज़ोर से बोले, "वाह! गुप्ता जी, आपकी जलेबी में तो गजब का स्वाद है!"
इतने में वहाँ भीड़ इकट्ठा हो गई। सभी लोग लालू जी की बातें सुनने लगे। लालू जी ने अपना नाटक जारी रखा, "भाइयों और बहनों! ऐसी स्वादिष्ट जलेबी आपने कभी नहीं खाई होगी। जिसने ये खाई, वो मज़े में जीया, जिसने नहीं खाई, वो पछताया!"
भीड़ में से एक आदमी बोला, "अच्छा, तो हमें भी चखने दो!"
गुप्ता जी मुस्कराए और बोले, "पहले पैसे दो, फिर जलेबी लो।"
देखते ही देखते लोग पैसे निकालने लगे, और गुप्ता जी की सारी जलेबी मिनटों में बिक गई। गुप्ता जी बड़े खुश हुए और बोले, "लालू, तेरा दिमाग़ तेज़ चलता है। ये ले, आधा पाव जलेबी फ्री में!"
लालू जी ने झट से जलेबी ली और बोले, "गुप्ता जी, व्यापार ऐसे ही बढ़ता है! अगली बार पकौड़े भी इसी स्टाइल में बेचेंगे!"
गाँव वालों ने तालियाँ बजाईं, और लालू जी मज़े से गरमागरम जलेबी चट कर गए!
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